1
রামমোহনের সঙ্গে সাক্ষাৎ ও বিভার শঙ্কা
আজ লোজনেরা ভারি ব্যস্ত। চারিদিকে বাজনা বাজিতেছে। গ্রামে যেন একটি উৎসব পড়িয়াছে। একে বিভার প্রাণে অধীর আনন্দ জাগিতেছে, তাহার পরে চারিদিকে বাজনার শব্দ শুনিয়া তাহায় হৃদয় যেন উচ্ছসিত হইয়া উঠিল। পাছে উদয়াদিত্যের কাছে তাহার এই অত্যধিক আনন্দ প্রকাশ হইয়া পড়ে, এই জন্য কত কষ্টে সে হাসি নিবারণ করিয়া রাখিয়াছে! উদয়াদিত্য নদী-তীরে উৎসবের ভাব দেখিয়া কি হইতেছে জানিবার জন্য গ্রামে বেড়াইতে গেলেন।
এমন কিছুক্ষণ গেল। একজন তীর হইতে জিজ্ঞাসা করিল— “কাহাদের নৌকা গা?” নৌকা হইতে রাজবাটীর ভৃত্যেরা বলিয়া উঠিল।—“কেও? রামমোহন যে? আরে, এস এস!” রামমোহন তাড়াতাড়ি নৌকায় প্রবেশ করিল। নৌকায় একলা বিভা বসিয়া আছে, রামমোহনকে দেখিয়া হর্ষে উচ্ছ্বসিত হইয়া কহিল-—“মোহন।”
রামমোহন—“মা।”
রামমোহন বিভার সেই সরল আনন্দে পরিপূর্ণ, হাসি হাসি মুখখানি অনেক ক্ষণ দেখিয়া ম্লান মুখে কহিল—“মা তুমি আজ আসিলে?”
বিভা তাড়াতাড়ি কহিল-“হাঁ, মোহন। মহারাজ কি ইহারি মধ্যে সংবাদ পাইয়াছেন? তুই কি আমাকে লইতে আসিয়াছিস্?”
রামমোহন কহিল—“না মা, অত ব্যস্ত হইও না—আজ থাক্—আর একদিন লইয়া যাইব।”
রামমোহনের ভাব দেখিয়া বিভা একেবারে মলিন হইয়া গিয়া কহিল —“কেন মোহন—আজ কেন যাইব না!”
রামমোহন কহিল—“আজ সন্ধ্যা হইয়া গিয়াছে—আজ থাক্, মা।”
বিভা নিতান্ত ভীত হইয়া কহিল, “সত্য করিয়া বল মোহন কি হইয়াছে?”
2
স্বামীর পুনর্বিবাহের সংবাদে বিভার মূর্চ্ছা
রামমোহন থাকিতে পারিল না। আত্মগোপন করা তাহার অভ্যাস নাই! সেইখানেই সে বসিয়া পড়িল—কাঁদিয়া কহিল—“মা জননী, আজ তোমার রাজ্যে তোমার স্থান নাই—তোমার রাজবাটীতে তোমার গৃহ নাই। আজ মহারাজ বিবাহ করিতেছেন।”
বিভার মুখ একেবারে পাণ্ডুবর্ণ হইয়া গেল। তাহার হাত পা হিম হইয়া গেল! রামমোহন কহিতে লাগিল, “মা, যখন তোর এই অধম সন্তান তোকে ডাকিতে গিয়াছিল, তখন তুই কেন আসিলি না, মা? তখন তুই নিষ্ঠুর পাষাণী হইয়া আমাকে কেন ফিরাইয়া দিলি মা? মহারাজের কাছে আমার যে আর মুখ রহিল না! বুক ফাটিয়া গেল, তবু যে তোর হইয়া একটি কথাও কহিতে পারিলাম না!”
বিভা আর চোখে কিছু দেখিতে পাইল না,—মাথা ঘুরিয়া সেইখানে পড়িয়া গেল। রামমোহন তাড়াতাড়ি জল আনিয়া বিভার মুখে চোখে ছিটা দিল। কিছুকণ পরে বিভা উঠিয়া বসিল। এক আঘাতে বিভার সমস্ত জগৎ ভাঙিয়া গেছে। স্বামীর রাজ্যের মধ্যে আসিয়া, রাজধানীর কাছে পৌঁছিয়া, রাজপুরীর দুয়ারে আসিয়া তৃষার্ত্ত-হৃদয় বিভার সমস্ত সুখের আশা মরীচিকার মত মিলাইয়া গেল।
বিভা আকুল ভাবে কহিল—“মোহন, তিনি যে আমাকে ডাকাইয়া পাঠাইলেন—আমার আসিতে কি বড় বিলম্ব হইয়াছে?
মোহন কহিল, “বিলম্ব হইয়াছে বৈকি।”
বিভা অধীর হইয়া কহিল—“আর কি মার্জ্জনা করিবেন না?”
মোহন কহিল—“মার্জ্জনা আর করিলেন কই?”
বিভা কহিল—“মোহন, আমি কেবল একবার তাঁহাকে দেখিতে যাইব।” বলিয়া ঊর্দ্ধশ্বাসে কাঁদিয়া উঠিল।
রামমোহন চোখ মুছিয়া কহিল—“আজ থাক্ না, মা।”
3
সাধারণ বেশে বিভার যাত্রা
বিভা কহিল—“না মোহন, আমি আজই একবার তাঁহাকে দেখিয়া আসিব।”
রামমোহন কহিল—“যুবরাজ আগে গ্রাম হইতে ফিরিয়া আসুন।”
বিভা কহিল—“না মোহন, আমি এখনি একবার যাই।”
বিভা মনে করিয়াছিল, উদয়াদিত্য এ সংবাদ শুনিলে অপমানের ভয়ে পাছে না যাইতে দেন।
রামমোহন কহিল—“তবে একখানি শিবিকা আনাই।”
বিভা কহিল—“শিবিকা কেন? আমি কি রাণী যে শিবিকা চাই। আমি একজন সামান্য প্রজার মত, একজন ভিখারিণীর মত যাইব—আমার শিবিকায় কাজ কি?”
রামমোহন কহিল—“আমার প্রাণ থাকিতে আমি তাহা দেখিতে পারিব না।”
বিভা কাতর স্বরে কহিল—“মোহন, তোর পায়ে পড়ি আমাকে আর বাধা দিস্ নে—বিলম্ব হইয়া যাইতেছে!”
রামমোহন ব্যথিত হৃদয়ে কহিল—“আচ্ছা মা, তাহাই হউক্।”
বিভা সামান্য রমণীর বেশে নৌকা হইতে বাহির হইল। নৌকার ভৃত্যেরা আসিয়া কহিল—“এ কি মা, এমন করিয়া এ বেশে কোথাও যাও।”
রামমোহন কহিল—“এ ত মায়েরই রাজ্য, যেখানে ইচ্ছা সেইখানেই যাইতে পারেন!”
ভৃত্যেরা আপত্তি করিতে লাগিল, রামমোহন তাহাদের ভাগাইয়া দিল।
1
রামমোহনের সঙ্গে সাক্ষাৎ ও বিভার শঙ্কা
আজ লোকজন খুব ব্যস্ত। চারদিকে বাজনা বাজছে। গ্রামে যেন একটা উৎসব লেগেছে। এমনিতেই বিভার মনে অধীর আনন্দ, তার উপর চারদিকের বাজনার শব্দ শুনে তার হৃদয় যেন উচ্ছ্বসিত হয়ে উঠল। উদয়াদিত্যের কাছে তার এই অতিরিক্ত আনন্দ প্রকাশ পেয়ে যাওয়ার ভয়ে সে অনেক কষ্টে হাসি চেপে রেখেছে! উদয়াদিত্য নদীর তীরে উৎসবের আমেজ দেখে কী হচ্ছে তা জানার জন্য গ্রামে ঘুরতে গেলেন।
এভাবে কিছুক্ষণ কাটল। তীর থেকে একজন জিজ্ঞেস করল— “কার নৌকা গো?” নৌকা থেকে রাজবাড়ির ভৃত্যরা বলে উঠল—“কে? রামমোহন যে? আরে, এসো এসো!” রামমোহন তাড়াতাড়ি নৌকায় প্রবেশ করল। নৌকায় একা বিভা বসে আছে। রামমোহনকে দেখে আনন্দে উচ্ছ্বসিত হয়ে সে বলল—“মোহন।”
রামমোহন—“মা।”
রামমোহন বিভার সেই সরল আনন্দে ভরা, হাসি-হাসি মুখটা অনেকক্ষণ ধরে দেখে ম্লান মুখে বলল— “মা, তুমি আজ এলে?”
বিভা তাড়াতাড়ি বলল—“হ্যাঁ, মোহন। মহারাজ কি এর মধ্যেই খবর পেয়েছেন? তুই কি আমাকে নিতে এসেছিস?”
রামমোহন বলল—“না মা, অত ব্যস্ত হয়ো না। আজ থাক, আর একদিন নিয়ে যাব।”
রামমোহনের হাবভাব দেখে বিভার মুখ একেবারে মলিন হয়ে গেল। সে বলল—“কেন মোহন? আজ কেন যাব না!”
রামমোহন বলল—“আজ সন্ধ্যা হয়ে গেছে—আজ থাক, মা।”
বিভা অত্যন্ত ভয় পেয়ে বলল, “সত্যি করে বল মোহন, কী হয়েছে?”
2
স্বামীর পুনর্বিবাহের সংবাদে বিভার মূর্চ্ছা
রামমোহন আর নিজেকে সামলাতে পারল না। সত্যি গোপন করা তার স্বভাব নয়! সে সেখানেই বসে পড়ল—কেঁদে বলল, “মা জননী, আজ তোমার রাজ্যে তোমার স্থান নেই—তোমার রাজবাড়িতে তোমার ঘর নেই। আজ মহারাজ বিয়ে করছেন।”
বিভার মুখ একেবারে পাণ্ডুর হয়ে গেল। তার হাত-পা হিম হয়ে গেল! রামমোহন বলতে লাগল, “মা, যখন তোর এই অধম সন্তান তোকে ডাকতে গিয়েছিল, তখন তুই কেন এলি না, মা? তখন তুই নিষ্ঠুর পাষাণীর মতো আমাকে কেন ফিরিয়ে দিলি মা? মহারাজের কাছে আমার যে আর মুখ রইল না! বুক ফেটে গেল, তবুও তোর হয়ে একটা কথাও বলতে পারলাম না!”
বিভা আর চোখে কিছু দেখতে পেল না—মাথা ঘুরে সেখানেই পড়ে গেল। রামমোহন তাড়াতাড়ি জল এনে বিভার মুখে-চোখে ছিটিয়ে দিল। কিছুক্ষণ পর বিভা উঠে বসল। এক আঘাতেই বিভার সমস্ত জগৎ ভেঙে গেছে। স্বামীর রাজ্যে এসে, রাজধানীর কাছে পৌঁছে, রাজপ্রাসাদের দরজায় এসে তৃষ্ণার্ত-হৃদয় বিভার সমস্ত সুখের আশা মরীচিকার মতো মিলিয়ে গেল।
বিভা আকুলভাবে বলল—“মোহন, উনি যে আমাকে ডেকে পাঠিয়েছিলেন—আমার আসতে কি খুব দেরি হয়েছে?”
মোহন বলল, “দেরি তো হয়েছেই।”
বিভা অধীর হয়ে বলল—“আর কি ক্ষমা করবেন না?”
মোহন বলল—“আর ক্ষমা করলেন কই?”
বিভা বলল—“মোহন, আমি শুধু একবার ওঁকে দেখতে যাব।” বলে ডুকরে কেঁদে উঠল।
রামমোহন চোখ মুছে বলল—“আজ থাক না, মা।”
3
সাধারণ বেশে বিভার যাত্রা
বিভা বলল, “না মোহন, আমি আজই একবার ওঁকে দেখে আসব।”
রামমোহন বলল, “যুবরাজ আগে গ্রাম থেকে ফিরে আসুন।”
বিভা বলল, “না মোহন, আমি এখনই একবার যাব।”
বিভা ভেবেছিল, উদয়াদিত্য এই খবর শুনলে অপমানের ভয়ে হয়তো যেতে দেবেন না।
রামমোহন বলল, “তবে একখানা পালকি আনাই।”
বিভা বলল, “পালকি কেন? আমি কি রানী যে পালকি চাইব? আমি একজন সাধারণ প্রজার মতো, একজন ভিখারিনীর মতো যাব—আমার পালকিতে কী কাজ?”
রামমোহন বলল, “আমার প্রাণ থাকতে আমি তা দেখতে পারব না।”
বিভা কাতর স্বরে বলল, “মোহন, তোর পায়ে পড়ি, আমাকে আর বাধা দিস না—দেরি হয়ে যাচ্ছে!”
রামমোহন ব্যথিত হৃদয়ে বলল, “আচ্ছা মা, তাই হোক।”
বিভা সাধারণ নারীর বেশে নৌকা থেকে বের হল। নৌকার ভৃত্যরা এসে বলল, “এ কী মা, এমনভাবে এই বেশে কোথায় যাচ্ছেন!”
রামমোহন বলল, “এ তো মায়েরই রাজ্য, যেখানে ইচ্ছা সেখানেই যেতে পারেন!”
ভৃত্যরা আপত্তি করতে লাগল, রামমোহন তাদের তাড়িয়ে দিল।
1
राममोहन से भेंट और विभा की आशंका
आज लोग बहुत व्यस्त हैं। चारों ओर बाजे बज रहे हैं। गाँव में मानो कोई उत्सव हो रहा है। एक तो विभा के मन में अधीर आनंद जाग रहा था, ऊपर से चारों ओर बाजों की आवाज़ सुनकर उसका हृदय जैसे उल्लास से भर उठा। कहीं उदयादित्य के सामने उसका यह अत्यधिक आनंद प्रकट न हो जाए, इसलिए उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोक रखी थी! उदयादित्य नदी किनारे उत्सव का माहौल देखकर यह जानने के लिए गाँव में घूमने गए कि क्या हो रहा है।
ऐसे ही कुछ देर बीती। किनारे से किसी ने पूछा- “यह किसकी नाव है?” नाव से राजमहल के सेवकों ने कहा- “कौन? अरे, राममोहन हो? आओ, आओ!” राममोहन जल्दी से नाव में चढ़ गया। नाव में विभा अकेली बैठी थी, राममोहन को देखकर वह खुशी से खिल उठी और बोली- “मोहन।”
राममोहन- “माँ।”
राममोहन विभा के उस सरल आनंद से भरे, मुस्कुराते हुए चेहरे को कुछ देर तक देखता रहा और फिर उदास चेहरे से बोला- “माँ, आप आज आ गईं?”
विभा ने जल्दी से कहा- “हाँ, मोहन। क्या महाराज को अब तक समाचार मिल गया है? क्या तू मुझे लेने आया है?”
राममोहन ने कहा- “नहीं माँ, इतनी जल्दी न करें- आज रहने दीजिए- किसी और दिन ले जाऊँगा।”
राममोहन का भाव देखकर विभा का चेहरा एकदम उतर गया और उसने कहा- “क्यों मोहन- आज क्यों नहीं जाऊँगी!”
राममोहन ने कहा- “आज शाम हो गई है- आज रहने दीजिए, माँ।”
विभा अत्यंत भयभीत होकर बोली, “सच-सच बताओ मोहन, क्या हुआ है?”
2
पति के पुनर्विवाह के समाचार पर विभा की मूर्छा
राममोहन से रहा न गया। कुछ छिपाना उसकी आदत नहीं थी! वह वहीं बैठ गया—और रोते हुए कहने लगा—“माँ जननी, आज तुम्हारे राज्य में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है—तुम्हारे राजमहल में तुम्हारा कोई घर नहीं है। आज महाराज विवाह कर रहे हैं।”
विभा का चेहरा बिल्कुल पीला पड़ गया। उसके हाथ-पैर ठंडे पड़ गए! राममोहन कहने लगा, “माँ, जब तुम्हारा यह अधम सेवक तुम्हें बुलाने गया था, तब तुम क्यों नहीं आईं, माँ? तब तुम इतनी निष्ठुर, पत्थर-दिल बनकर मुझे क्यों लौटा दिया, माँ? महाराज के सामने मेरा मुँह दिखाने लायक नहीं रहा! मेरा हृदय विदीर्ण हो गया, फिर भी मैं तुम्हारे पक्ष में एक भी शब्द नहीं कह सका!”
विभा की आँखों के आगे अँधेरा छा गया,—उसका सिर चकरा गया और वह वहीं गिर पड़ी। राममोहन ने जल्दी से पानी लाकर विभा के मुँह और आँखों पर छींटे मारे। कुछ देर बाद विभा उठकर बैठ गई। एक ही आघात से विभा की पूरी दुनिया उजड़ गई थी। अपने पति के राज्य में आकर, राजधानी के पास पहुँचकर, राजमहल के द्वार पर आकर, प्यासे हृदय वाली विभा की सुख की सारी आशा एक मृगतृष्णा की तरह विलीन हो गई।
विभा ने व्याकुल होकर कहा—“मोहन, उन्होंने तो मुझे बुलवाया था—क्या मेरे आने में बहुत देर हो गई?”
मोहन ने कहा, “देर तो हो ही गई है।”
विभा ने अधीर होकर कहा—“क्या वे अब क्षमा नहीं करेंगे?”
मोहन ने कहा—“उन्होंने क्षमा कहाँ की?”
विभा ने कहा—“मोहन, मैं बस एक बार उन्हें देखने जाऊँगी।” यह कहकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
राममोहन ने आँखें पोंछकर कहा—“आज रहने दो न, माँ।”
3
साधारण वेश में विभा की यात्रा
विभा ने कहा, “नहीं मोहन, मैं आज ही एक बार उनसे मिलकर आऊँगी।”
राममोहन ने कहा, “पहले युवराज को गाँव से लौट तो आने दीजिए।”
विभा ने कहा, “नहीं मोहन, मैं अभी जाऊँगी।”
विभा ने सोचा था कि यह खबर सुनकर उदयादित्य अपमान के डर से कहीं उसे जाने न दें।
राममोहन ने कहा, “तो फिर मैं एक पालकी मँगवाता हूँ।”
विभा ने कहा, “पालकी क्यों? क्या मैं रानी हूँ जो पालकी माँगूँगी? मैं एक साधारण प्रजा की तरह, एक भिखारिन की तरह जाऊँगी - मुझे पालकी का क्या काम?”
राममोहन ने कहा, “मेरे जीते-जी मैं यह नहीं देख सकता।”
विभा ने कातर स्वर में कहा, “मोहन, मैं तेरे पैर पड़ती हूँ, मुझे और मत रोक - देर हो रही है!”
राममोहन ने दुखी मन से कहा, “अच्छा माँ, वैसा ही हो।”
विभा एक साधारण स्त्री के वेश में नाव से बाहर निकली। नाव के सेवकों ने आकर कहा, “यह क्या माँ, इस तरह इस वेश में आप कहाँ जा रही हैं?”
राममोहन ने कहा, “यह तो माँ का ही राज्य है, जहाँ इच्छा हो वहीं जा सकती हैं!”
सेवक आपत्ति करने लगे, तो राममोहन ने उन्हें भगा दिया।
1
The Meeting with Rammohan and Vibha's Dread
Today the people were very busy. Music was playing all around. It seemed as if a festival had come to the village. An impatient joy was already stirring in Vibha's heart, and upon hearing the sounds of music from all around, her heart seemed to overflow. Fearing that her excessive joy would be revealed to Udayaditya, she suppressed her smile with great difficulty! Seeing the festive mood on the riverbank, Udayaditya went for a walk in the village to find out what was happening.
A little while passed. Someone from the bank asked, “Whose boat is that?” From the boat, the palace retainers called out. “Who’s that? It’s Rammohan! Hey, come on, come on!” Rammohan quickly boarded the boat. Vibha was sitting alone on the boat. Seeing Rammohan, she exclaimed, overflowing with joy, “Mohan.”
Rammohan said, “Ma.”
After looking for a long while at Vibha's face, so full of simple joy and ready to smile, Rammohan said with a crestfallen expression, “Ma, you’ve come today?”
Vibha said quickly, “Yes, Mohan. Has the Maharaj received the news already? Have you come to take me?”
Rammohan said, “No, Ma, don’t be in such a hurry—let it be for today—I will take you another day.”
Seeing Rammohan's expression, Vibha's face fell completely, and she said, “Why, Mohan—why won't I go today!”
Rammohan said, “It’s already evening—let it be for today, Ma.”
Vibha, becoming utterly frightened, said, “Tell me the truth, Mohan, what has happened?”
2
Vibha Faints at the News of Her Husband’s Remarriage
Rammohan could not hold back any longer. It was not in his nature to hide the truth! He sat down right there and, weeping, said, “Revered Mother, today in your own kingdom there is no place for you—in your own royal palace, there is no home for you. Today, the Maharaj is getting married.”
Vibha’s face turned completely pale. Her hands and feet grew ice-cold! Rammohan continued, “Mother, when this unworthy son of yours went to summon you, why did you not come then, Mother? Why did you become a cruel, stone-hearted woman and send me back? I was left with no face before the Maharaj! My heart was breaking, yet I could not speak a single word on your behalf!”
Vibha could no longer see anything—her head spun, and she fell right there. Rammohan quickly brought water and sprinkled it on her face and eyes. A short while later, Vibha sat up. With a single blow, her entire world had shattered. Having entered her husband’s kingdom, reached the capital, and arrived at the very gates of the royal palace, all the hopes of happiness for the thirst-hearted Vibha vanished like a mirage.
Vibha asked in anguish, “Mohan, but he sent for me—am I very late in coming?”
Mohan replied, “You are late indeed.”
Vibha said desperately, “Will he not forgive me anymore?”
Mohan replied, “But he offered no forgiveness.”
Vibha said, “Mohan, I will go just to see him once.” Saying this, she broke down, sobbing breathlessly.
Wiping his eyes, Rammohan said, “Let it be for today, Mother.”
3
Vibha's Journey in a Commoner's Guise
Vibha said, “No, Mohan, I will go and see him this very day.”
Rammohan replied, “Let the Yubaraj first return from the village.”
“No, Mohan,” said Vibha, “I will go this instant.”
Vibha had thought that if Udayaditya heard this news, he would forbid her from going for fear of the humiliation.
Rammohan said, “Then I shall have a palanquin brought.”
Vibha said, “A palanquin? Why? Am I a queen that I should ask for a palanquin? I will go like a common subject, like a beggar-woman—what use have I for a palanquin?”
Rammohan said, “As long as I live, I cannot bear to see that.”
Vibha pleaded in a distressed voice, “Mohan, I beg of you, don't stop me any longer—it is getting late!”
With a pained heart, Rammohan said, “Very well, Ma. So be it.”
Dressed as a common woman, Vibha stepped out from the boat. The boat's servants came forward and said, “What is this, Ma? Where are you going dressed like this?”
Rammohan said, “This is the Mother's own kingdom; she may go wherever she wishes!”
The servants started to object, but Rammohan chased them away.
1
ラムモハンとの面会とビバの不安
今日、人々はひどく忙しそうだ。あちこちで楽器が鳴り響いている。村ではまるでお祭りが始まったかのようだ。ただでさえビバの心は逸る喜びに満ちていたが、さらに四方から聞こえる楽器の音に、彼女の胸は高鳴るばかりだった。兄ウダヤディティヤにこのあふれんばかりの喜びを見透かされまいと、彼女は懸命に笑みをこらえていた。ウダヤディティヤは、川岸の祭りめいた様子を見て、何事かと確かめるために村へ散策に出かけた。
そうしてしばらく経った。岸から一人が尋ねた。「どなたの船ですかな?」船の中から王宮の従者たちが声を上げた。「誰かと思えば、ラムモハンではないか!おい、こちらへ、こちらへ!」ラムモハンは急いで船に乗り込んできた。船には一人で座っていたビバが、ラムモハンを見ると喜びに満ちあふれ、声をかけた。「モーハン」
ラムモハンは言った。「奥方様」
ラムモハンは、ビバのその無邪気な喜びに満ちた、輝くような笑顔をしばらく見つめていたが、やがて顔を曇らせて言った。「奥方様、今日お着きになられたのですか?」
ビバは早口に言った。「ええ、モーハン。マハラジャはもう知らせをお聞きになったの?私を迎えに来てくれたのでしょう?」
ラムモハンは言った。「いいえ、奥方様、そうお急ぎなさいますな。今日はこのままお泊りください。また日を改めてお迎えに参ります」
ラムモハンの様子を見て、ビバの顔からさっと血の気が引いた。「どうして、モーハン。どうして今日は行けないの!」
ラムモハンは言った。「もう日が暮れてしまいましたから。今日はこのままで、奥方様」
ビバはすっかりおびえて言った。「本当のことを言って、モーハン。何があったの?」
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夫の再婚の知らせに気絶するビバ
ラムモハンはもはや耐えられなかった。感情を隠すことなど、彼にはできなかった。その場に彼は座り込むと、泣きながら言った。「奥方様、今日、あなたの王国にあなたの居場所はございません。あなたの王宮にあなたの家はございません。本日、マハラジャは御結婚なされます。」
ビバの顔は真っ青になった。手足は氷のように冷たくなった。ラムモハンは続けた。「奥方様、この卑しい僕めがあなた様をお迎えに参った時、なぜ来てくださらなかったのですか、奥方様。あの時、なぜあなたは非情にも、石のような心で私を追い返されたのですか?マハラジャの前で、私はもう顔向けができません!胸が張り裂けそうでした。それでも、あなた様のために一言も申し上げることができなかったのです!」
ビバはもはや何も見ることができず、めまいがしてその場に倒れ込んだ。ラムモハンは急いで水を持ってきて、ビバの顔や目に振りかけた。しばらくして、ビバは起き上がった。たった一撃で、ビバの世界はすべて打ち砕かれた。夫の王国に入り、都にたどり着き、王宮の門前に来て、渇ききったビバの心の幸福への望みは、すべて蜃気楼のように消え去った。
ビバは取り乱した様子で言った。「モーハン、あの方は私を呼びに使いをよこされたのに、私が来るのが遅すぎたのでしょうか?」
モーハンは言った。「遅すぎましたとも。」
ビバは焦って言った。「もうお許しにはならないのでしょうか?」
モーハンは言った。「お許しになどなりませんでした。」
ビバは言った。「モーハン、一度だけでもあの方にお会いしに行きます。」そう言うと、息も絶え絶えに泣き崩れた。
ラムモハンは目を拭いながら言った。「奥方様、今日はもうおやめください。」
3
平民の姿でのビバの旅立ち
ビバは言った。「いいえ、ラムモハン。今日一度、あの方に会いに行きますわ。」
ラムモハンは言った。「王太子様が村からお戻りになるまでお待ちください。」
ビバは言った。「いいえ、ラムモハン。今すぐ行きます。」
ビバは、兄のウダヤディティヤがこの知らせを聞けば、侮辱を恐れて行かせてはくれないだろうと考えていた。
ラムモハンは言った。「では、輿を一台お呼びいたします。」
ビバは言った。「輿ですって?私が輿を望むような王妃だとでもいうのですか。私は一介の民のように、物乞いの女のように行くのです。輿など必要ありませんわ。」
ラムモハンは言った。「私が生きている限り、そのようなことはさせられません。」
ビバは悲痛な声で言った。「ラムモハン、お願いですからもう私を止めないでください。手遅れになってしまいますわ!」
ラムモハンは心を痛めながら言った。「承知いたしました、奥方様。お望みのとおりに。」
ビバは質素な女の身なりで船から出た。船の従者たちがやって来て言った。「これは奥方様、そのようなお姿でどこへ行かれるのですか。」
ラムモハンは言った。「ここは奥方様の国だ。お好きなところへ行かれるさ!」
従者たちが反対し始めると、ラムモハンは彼らを追い払った。