1 প্রতাপাদিত্যের অহংকার ও কন্যা বিভা

সুরমা কি আর নাই? বিভার কিছুতেই তাহা মনে হয় না কেন? যেন সুরমার দেখা পাইবে, যেন সুরমা ঐ দিকে কোথায় আছে। বিভা ঘরে ঘরে ঘুরিয়া বেড়ায়, তাহার প্রাণ যেন সুরমাকে খুঁজিয়া বেড়াইতেছে। চুল বাঁধিবার সময় সে চুপ করিয়া বসিয়া থাকে, যেন এখনি সুরমা আসিবে, তাহার চুল বাঁধিয়া দিবে, তাহারি জন্য অপেক্ষা করিতেছে। না রে না, সন্ধ্যা হইয়া আসিল, রাত্রি হইয়া আসে, সুরমা বুঝি আর আসিল না, চুল বাঁধা আর হইল না। আজ বিভার মুখ এত মলিন হইয়া গিয়াছে, আজ বিভা এত কাঁদিতেছে, তবু কেন সুরমা আসিল না, সুরমা ত কখন এমন করে না! বিভার মুখ একটু মলিন হইলেই অমনি সুরমা তাহার কাছে আসে, তাহার গলা ধরে, প্রাণ জুড়াইয়া তাহার মুখের পানে চাহিয়া থাকে, আর আজ—ওরে, আজ বুক ফাটিয়া গেলেও সে আসিবে না।

উদয়াদিত্যের অর্দ্ধেক বল, অর্দ্ধেক প্রাণ চলিয়া গিয়াছে। প্রত্যেক কাজে যে তাঁহার আশা ছিল, উৎসাহ ছিল, যাহার মন্ত্রণা তাঁহার একমাত্র সহায় ছিল, যাহার হাসি তাঁহার একমাত্র পুরস্কার ছিল—সেই চলিয়া গেল! তিনি তাঁহার শয়ন-গৃহে যাইতেন, যেন কি ভাবিতেন, একবার চারিদিক্‌ দেখিতেন, দেখিতেন—কেহ নাই! ধীরে ধীরে সেই বাতায়নে আসিয়া বসিতেন; যেখানে সুরমা বসিত সেইখানটি শূন্য রাখিয়া দিতেন, আকাশে সেই জ্যোৎস্না, সম্মুখে সেই কানন, তেমনি করিয়া বাতাস বহিতেছে—মনে করিতেন, এমন সন্ধ্যায় সুরমা কি না আসিয়া থাকিতে পারিবে?

সহসা তাঁহার মনে হইত, যেন সুরমার মত কার গলার স্বর শুনিতে পাইলাম, চমকিয়া উঠিতেন, যদিও অসম্ভব মনে হইত, তবু একবার চারিদিকে দেখিতেন, একবার বিছানায় যাইতেন, দেখিতেন—কেহ আছে কি না! যে উদয়াদিত্য সমস্ত দিন শত শত ক্ষুদ্র কাজে ব্যস্ত থাকিতেন, দরিদ্র প্রজারা তাহাদের ক্ষেতের ও বাগানের ফল মূল শাক সবজি উপহার লইয়া তাঁহার কাছে আসিত, তিনি তাহাদের জিজ্ঞাসা পড়া করিতেন, তাহাদের পরামর্শ দিতেন; আজ কাল আর সে সব কিছুই করিতে পারেন না, তবুও সন্ধ্যাবেলায় শ্রান্ত হইয়া পড়েন— শ্রান্তপদে শয়নালয়ে আসেন, মনের মধ্যে যেন একটা আশা থাকে যে, সহসা শয়নকক্ষের দ্বার খুলিলেই দেখিতে পাইব—সুরমা সেই বাতায়নে বসিয়া আছে। উদয়াদিত্য যখন দেখিতে পান, বিভা একাকী ম্লান মুখে ঘুরিয়া বেড়াইতেছে, তখন তাঁহার প্রাণ কাঁদিয়া উঠে। বিভাকে কাছে ডাকেন, তাহাকে আদর করেন, তাহাকে কত কি স্নেহের কথা বলেন, অবশেষে দাদার হাত ধরিয়া বিভা কাঁদিয়া উঠে, উদয়াদিত্যেরও চোখ দিয়া জল পড়িতে থাকে! এক দিন উদয়াদিত্য বিভাকে ডাকিয়া কহিলেন, “বিভা, এ বাড়িতে আর তোর কে রহিল? তোকে এখন শ্বশুরবাড়ি পাঠাইবার বন্দোবস্ত করিয়া দিই। কি বলিস? আমার কাছে লজ্জা করিস্ না বিভা! তুই আর কার কাছে তোর মনের সাধ প্রকাশ করিবি বল্?” বিভা চুপ করিয়া রহিল। কিছু বলিল না। এ কথা কি আর জিজ্ঞাসা করিতে হয়? পিতৃ-ভবনে কি আর তাহার থাকিতে ইচ্ছা করে? পৃথিবীতে যে তাহার একমাত্র জুড়াইবার স্থল আছে, সেইখানে—সেই চন্দ্রদ্বীপে যাইবার জন্য তাহার প্রাণ অস্থির হইবে না ত কি? কিন্তু তাহাকে লইতে পর্য্যন্ত একটিও ত লোক আসিল না! কেন আসিল না?

বিভাকে শ্বশুরবাড়ি পাঠাইবার প্রস্তাব উদয়াদিত্য একবার পিতার নিকট উত্থাপন করিলেন। প্রতাপাদিত্য কহিলেন, “বিভাকে শ্বশুরবাড়ি পাঠাইতে আমার কোন আপত্তি নাই। কিন্তু তাহাদের নিকট যদি বিভার কোন আদর থাকিত, তবে তাহারা বিভাকে লইতে নিজে হইতে লোক পাঠাইত। আমাদের অত ব্যস্ত হইবার আবশ্যক দেখি না!”

রাজমহিষী বিভাকে দেখিয়া কান্নাকাটি করেন। বিভার সধবা অবস্থায় বৈধব্য কি চোখে দেখা যায়? বিভার করুণ মুখখানি দেখিলে তাঁহার প্রাণে শেল বাজে। তাহা ছাড়া মহিষী তাঁহার জামাতাকে অত্যন্ত ভালবাসেন, সে একটা কি ছেলেমানুষী করিয়াছে বলিয়া তাহার ফল যে এত দূর পর্য্যন্ত হইবে, ইহা তাঁহার কিছুতেই ভাল লাগে নাই। তিনি মহারাজের কাছে গিয়া মিনতি করিয়া বলিলেন, “মহারাজ বিভাকে শ্বশুরবাড়ি পাঠাও!” মহারাজ রাগ করিলেন, কহিলেন “ঐ এককথা আমি অনেক বার শুনিয়াছি, আর আমাকে বিরক্ত করিও না। যখন তাহারা বিভাকে ভিক্ষা চাহিবে, তখন তাহারা বিভাকে পাইবে!” মহিষী কহিলেন, “মেয়ে অধিক দিন শ্বশুরবাড়ি না গেলে দশ জনে কি বলিবে?” প্রতাপাদিত্য কহিলেন, “আর—প্রতাপাদিত্য নিজে সাধিয়া যদি মেয়েকে পাঠায় আর রামচন্দ্র রায় যদি তাহাকে দ্বার হইতে দূর করিয়া দেয়, তাহা হইলেই বা দশ জনে কি বলিবে?”

মহিষী কাঁদিতে কাঁদিতে ভাবিলেন, মহারাজা এক এক সময় কি যে করেন তাহার কোন ঠিকানা থাকে না।

1 প্রতাপাদিত্যের অহংকার ও কন্যা বিভা

সুরমা কি আর নেই? বিভার কিছুতেই তা মনে হয় না কেন? মনে হয়, সে যেন সুরমার দেখা পাবে, সুরমা যেন ঐ দিকেই কোথাও আছে। বিভা ঘরে ঘরে ঘুরে বেড়ায়, তার প্রাণ যেন সুরমাকে খুঁজে বেড়াচ্ছে। চুল বাঁধার সময় সে চুপ করে বসে থাকে, যেন এখনই সুরমা এসে তার চুল বেঁধে দেবে, তারই জন্য অপেক্ষা করছে। না, না, সন্ধ্যা হয়ে এল, রাত ঘনিয়ে আসছে, সুরমা আর এল না, চুলও আর বাঁধা হল না। আজ বিভার মুখ এত মলিন, আজ বিভা এত কাঁদছে, তবুও কেন সুরমা এল না? সুরমা তো কখনও এমন করে না! বিভার মুখ একটু মলিন হলেই সুরমা তার কাছে ছুটে আসত, তার গলা জড়িয়ে ধরত, মনপ্রাণ জুড়িয়ে তার মুখের দিকে চেয়ে থাকত। আর আজ—আজ যে বুক ফেটে গেলেও সে আসবে না।

উদয়াদিত্যের অর্ধেক শক্তি, অর্ধেক প্রাণ যেন চলে গেছে। প্রত্যেক কাজে যিনি তাঁর আশা ছিলেন, উৎসাহ ছিলেন, যাঁর পরামর্শ ছিল তাঁর একমাত্র সহায়, যাঁর হাসি ছিল তাঁর একমাত্র পুরস্কার—তিনিই চলে গেলেন! তিনি তাঁর শোবার ঘরে যেতেন, কী যেন ভাবতেন, একবার চারদিকে তাকিয়ে দেখতেন—কেউ নেই! ধীরে ধীরে সেই জানলার কাছে এসে বসতেন; যেখানে সুরমা বসত, সেই জায়গাটা শূন্য রাখতেন। আকাশে সেই একই জ্যোৎস্না, সামনে সেই বাগান, তেমনি বাতাস বইছে—মনে করতেন, এমন সন্ধ্যায় সুরমা কি না এসে থাকতে পারবে?

হঠাৎ তাঁর মনে হত, যেন সুরমার মতো কারও গলার স্বর শুনতে পেলেন। তিনি চমকে উঠতেন। যদিও অসম্ভব মনে হত, তবুও একবার চারদিকে দেখতেন, বিছানার কাছে গিয়ে দেখতেন—কেউ আছে কি না! যে উদয়াদিত্য সারাদিন শত শত ছোটোখাটো কাজে ব্যস্ত থাকতেন, গরিব প্রজারা তাদের ক্ষেত-বাগানের ফলমূল, শাকসবজি উপহার নিয়ে তাঁর কাছে আসত, তিনি তাদের খোঁজখবর নিতেন, পরামর্শ দিতেন; আজকাল আর সেসব কিছুই করতে পারেন না। তবুও সন্ধ্যায় তিনি ক্লান্ত হয়ে পড়েন—ক্লান্ত পায়ে শোবার ঘরে আসেন, মনের মধ্যে যেন একটা আশা থাকে যে, হঠাৎ ঘরের দরজা খুললেই দেখতে পাবেন—সুরমা সেই জানলার ধারে বসে আছে। উদয়াদিত্য যখন দেখেন, বিভা একা ম্লান মুখে ঘুরে বেড়াচ্ছে, তখন তাঁর বুক ফেটে যায়। তিনি বিভাকে কাছে ডাকেন, আদর করেন, কত স্নেহের কথা বলেন। শেষে দাদার হাত ধরে বিভা কেঁদে ফেলে, উদয়াদিত্যেরও চোখ দিয়ে জল পড়তে থাকে। একদিন উদয়াদিত্য বিভাকে ডেকে বললেন, “বিভা, এই বাড়িতে তোর আর কে রইল? তোকে এখন শ্বশুরবাড়ি পাঠানোর ব্যবস্থা করে দিই। কী বলিস? আমার কাছে লজ্জা করিস না, বিভা! তুই আর কার কাছে তোর মনের ইচ্ছের কথা বলবি?” বিভা চুপ করে রইল। কিছু বলল না। এ কথা কি আর জিজ্ঞাসা করতে হয়? বাবার বাড়িতে কি আর তার থাকতে ইচ্ছে করে? পৃথিবীতে তার শান্তি পাওয়ার যে একমাত্র জায়গা আছে, সেইখানে—সেই চন্দ্রদ্বীপে যাওয়ার জন্য তার প্রাণ আকুল হবে না তো কী? কিন্তু তাকে নিয়ে যাওয়ার জন্য তো একজন লোকও এল না! কেন এল না?

বিভাকে শ্বশুরবাড়ি পাঠানোর প্রস্তাব উদয়াদিত্য একবার তাঁর বাবার কাছে তুললেন। প্রতাপাদিত্য বললেন, “বিভাকে শ্বশুরবাড়ি পাঠাতে আমার কোনো আপত্তি নেই। কিন্তু ওদের কাছে যদি বিভার কোনো কদর থাকত, তাহলে ওরাই ওকে নিয়ে যাওয়ার জন্য নিজে থেকে লোক পাঠাত। আমাদের এত ব্যস্ত হওয়ার প্রয়োজন দেখছি না!”

রাজমহিষী বিভাকে দেখে কান্নাকাটি করেন। বিভার এই সধবা হয়েও বিধবার মতো দশা কি চোখে দেখা যায়? বিভার করুণ মুখ দেখলে তাঁর বুকে শেল বেঁধে। তাছাড়া, মহিষী তাঁর জামাইকে খুব ভালোবাসেন। সে একটা ছেলেমানুষি করেছে বলে তার ফল যে এতদূর গড়াবে, এটা তাঁর একেবারেই ভালো লাগেনি। তিনি মহারাজের কাছে গিয়ে মিনতি করে বললেন, “মহারাজ, বিভাকে শ্বশুরবাড়ি পাঠান!” মহারাজ রেগে গিয়ে বললেন, “ওই এক কথা আমি অনেকবার শুনেছি, আর আমাকে বিরক্ত কোরো না। যখন ওরা বিভাকে ভিক্ষা চাইবে, তখনই পাবে!” মহিষী বললেন, “মেয়ে এতদিন শ্বশুরবাড়ি না গেলে লোকে কী বলবে?” প্রতাপাদিত্য বললেন, “আর প্রতাপাদিত্য নিজে সেধে মেয়েকে পাঠালে রামচন্দ্র রায় যদি তাকে দরজা থেকে তাড়িয়ে দেয়, তাহলেই বা লোকে কী বলবে?”

মহিষী কাঁদতে কাঁদতে ভাবলেন, মহারাজ মাঝে মাঝে যে কী করেন, তার কোনো ঠিকঠিকানা থাকে না।

1 प्रतापादित्य का अभिमान और बेटी विभा

क्या सुरमा अब नहीं रही? विभा को ऐसा क्यों नहीं लगता? उसे लगता है जैसे वह सुरमा से मिलेगी, जैसे सुरमा यहीं कहीं आस-पास है। विभा कमरे-कमरे में घूमती फिरती है, मानो उसकी आत्मा सुरमा को ढूँढ़ रही हो। बाल बाँधने के समय वह चुपचाप बैठी रहती है, मानो अभी सुरमा आएगी और उसके बाल बाँध देगी, उसी का इंतज़ार कर रही हो। नहीं रे नहीं, शाम हो गई, रात होने को आई, लगता है सुरमा अब नहीं आई, और बाल भी नहीं बँधे। आज विभा का चेहरा इतना उदास हो गया है, आज विभा इतना रो रही है, फिर भी सुरमा क्यों नहीं आई, सुरमा तो कभी ऐसा नहीं करती! विभा का चेहरा ज़रा भी उदास होता तो सुरमा तुरंत उसके पास आती, उसे गले लगा लेती, और बड़े प्यार से उसका चेहरा देखती रहती थी, पर आज—अरे, आज तो सीना फट जाने पर भी वह नहीं आएगी।

उदयादित्य की आधी शक्ति, आधी आत्मा चली गई है। हर काम में जो उनकी आशा थी, उत्साह थी, जिसकी सलाह उनका एकमात्र सहारा थी, जिसकी हँसी उनका एकमात्र पुरस्कार थी—वही चली गई! वह अपने शयनकक्ष में जाते, कुछ सोचते, एक बार चारों ओर देखते, और पाते—कोई नहीं है! धीरे-धीरे उस खिड़की पर आकर बैठते; जहाँ सुरमा बैठती थी वह जगह खाली छोड़ देते थे, आकाश में वही चाँदनी, सामने वही बगीचा, वैसे ही हवा बह रही है— सोचते थे, क्या ऐसी शाम में सुरमा आए बिना रह सकेगी?

अचानक उन्हें लगता, मानो सुरमा जैसी किसी की आवाज़ सुनाई दी हो, वह चौंक उठते, हालाँकि यह असंभव लगता था, फिर भी एक बार चारों ओर देखते, एक बार बिस्तर के पास जाते, देखते—कि कोई है या नहीं! जो उदयादित्य दिन भर सैकड़ों छोटे-मोटे कामों में व्यस्त रहते थे, गरीब प्रजा अपने खेतों और बागों के फल, मूल, साग-सब्जी उपहार लेकर उनके पास आती थी, वह उनसे पूछताछ करते थे, उन्हें सलाह देते थे; आजकल वह यह सब कुछ नहीं कर पाते, फिर भी शाम को थक जाते हैं— थके कदमों से शयनकक्ष में आते हैं, मन में एक आशा-सी रहती है कि अचानक शयनकक्ष का दरवाज़ा खोलने पर देखूँगा—सुरमा उसी खिड़की पर बैठी है। जब उदयादित्य देखते हैं कि विभा अकेले उदास चेहरे के साथ घूम रही है, तो उनका दिल रो उठता है। वह विभा को पास बुलाते हैं, उसे दुलार करते हैं, उससे कितनी ही स्नेहभरी बातें करते हैं, अंत में भाई का हाथ पकड़कर विभा रो पड़ती है, और उदयादित्य की आँखों से भी आँसू बहने लगते हैं! एक दिन उदयादित्य ने विभा को बुलाकर कहा, “विभा, इस घर में अब तेरा कौन रहा? मैं तुझे ससुराल भेजने की व्यवस्था कर देता हूँ। क्या कहती है? मुझसे शर्मा मत विभा! तू अपनी मन की इच्छा और किससे कहेगी बता?” विभा चुप रही। कुछ नहीं बोली। क्या यह बात पूछने की है? क्या अब उसे अपने पिता के घर में रहने की इच्छा है? पृथ्वी पर जो उसका एकमात्र सुकून का ठिकाना है, वहाँ—उस चंद्रद्वीप जाने के लिए उसका मन व्याकुल नहीं होगा तो और क्या होगा? लेकिन उसे लेने के लिए तो एक भी आदमी नहीं आया! क्यों नहीं आया?

विभा को ससुराल भेजने का प्रस्ताव उदयादित्य ने एक बार अपने पिता के सामने रखा। प्रतापादित्य ने कहा, “विभा को ससुराल भेजने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अगर उनके मन में विभा के लिए कोई कद्र होती, तो वे उसे लेने के लिए खुद लोग भेजते। मुझे इतनी जल्दी करने की कोई ज़रूरत नहीं दिखती!”

राजमहिषी विभा को देखकर रो पड़ती हैं। विभा की सुहागिन होते हुए भी यह विधवा जैसी दशा क्या आँखों से देखी जाती है? विभा का करुण चेहरा देखकर उनके कलेजे में शूल सा चुभता है। इसके अलावा, महिषी अपने दामाद को बहुत प्यार करती हैं, उसने कोई बचपना कर दिया तो उसका परिणाम इतना दूर तक जाएगा, यह उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। उन्होंने महाराज के पास जाकर विनती करते हुए कहा, “महाराज, विभा को ससुराल भेज दीजिए!” महाराज क्रोधित हो गए, बोले “यह एक ही बात मैं कई बार सुन चुका हूँ, अब मुझे और परेशान मत करो। जब वे विभा को भीख में माँगेंगे, तब वे उसे पाएँगे!” महिषी ने कहा, “बेटी ज़्यादा दिन ससुराल न जाए तो दस लोग क्या कहेंगे?” प्रतापादित्य ने कहा, “और—अगर प्रतापादित्य खुद आग्रह करके बेटी को भेजे और रामचंद्र राय उसे दरवाज़े से ही लौटा दे, तब दस लोग क्या कहेंगे?”

महिषी रोते-रोते सोचने लगीं, महाराजा कभी-कभी क्या कर बैठते हैं उसका कोई ठिकाना नहीं रहता।

1 Pratapaditya's Pride and His Daughter Vibha

Is Surma truly gone? Why can't Vibha bring herself to believe it? It is as if she will see Surma, as if Surma is somewhere just over there. Vibha wanders from room to room, her very soul seeming to search for Surma. When it is time to braid her hair, she sits quietly, as if Surma will come at any moment to braid it for her; she is waiting for her. But no, evening has fallen, night is approaching, and it seems Surma will not come after all; her hair remains unbraided. Today, Vibha’s face is so downcast, today Vibha is weeping so much, yet why has Surma not come? Surma never does this! The moment Vibha’s face looked even a little sad, Surma would come to her, take her by the neck, and gaze into her face, soothing her soul. But today—oh, today, even if her heart were to break, she will not come.

Half of Udayaditya's strength, half his very life, was gone. The one who was his hope in every task, his enthusiasm, whose counsel was his only support, whose smile was his only reward—she was gone! He would go to his bedchamber, seem to ponder something, and glance around once, only to see—no one was there! Slowly, he would come and sit at that window; he would leave the spot where Surma used to sit empty. In the sky was the same moonlight, before him the same garden, the breeze blowing just as it did—and he would think, on such an evening, how could Surma possibly stay away?

Suddenly, it would seem to him that he heard a voice like Surma's. He would startle, and though he knew it was impossible, he would look around, go to the bed, and see if anyone was there! The Udayaditya who used to stay busy all day with hundreds of small tasks, to whom poor subjects would come with gifts of fruits, roots, and vegetables from their fields and gardens, and he would make inquiries about them, give them advice; these days he could do none of that, yet by evening he would be exhausted. With weary steps, he would come to his chamber, a flicker of hope in his heart that as soon as he opened the door, he would see Surma sitting at that window. When Udayaditya saw Vibha wandering about alone with a sorrowful face, his heart cried out. He would call Vibha to him, caress her, speak so many words of affection to her, and finally, holding her brother's hand, Vibha would burst into tears, and tears would stream from Udayaditya's eyes too! One day, Udayaditya called Vibha and said, “Vibha, who is left for you in this house? Let me arrange to send you to your in-laws' home now. What do you say? Don’t be shy with me, Vibha! To whom else can you express your heart's desire?” Vibha remained silent. She said nothing. Did such a question even need to be asked? Did she have any desire left to stay in her father's house? For her soul to go to that one place of solace she had on earth, to that Chandradwip—would it not be restless? But not a single person had come to fetch her! Why had they not come?

Udayaditya once raised the proposal of sending Vibha to her in-laws' home before his father. Pratapaditya said, “I have no objection to sending Vibha to her in-laws' home. But if they had any affection for Vibha, they would have sent people to fetch her themselves. I see no need for us to be so busy about it!”

The Rajmahishi would weep and wail upon seeing Vibha. How could she bear to see Vibha's widowhood while her husband was still alive? The sight of Vibha’s sorrowful face was like a spear in her heart. Besides, the Mahishi was extremely fond of her son-in-law; that he had committed some childish act and its consequences would go this far, she did not like at all. She went to the Maharaj and pleaded, “Maharaj, send Vibha to her in-laws' home!” The Maharaj grew angry and said, “I have heard that same thing many times, do not bother me again. When they beg for Vibha, they will get her!” The Mahishi said, “If a daughter does not go to her in-laws' house for a long time, what will people say?” Pratapaditya replied, “And—if Pratapaditya himself willingly sends his daughter and Ramchandra Ray turns her away from the door, then what will people say?”

Weeping, the Mahishi thought to herself that there was no telling what the Maharaja would do from one moment to the next.

1 プラタパディティヤのプライドと娘ビバ

スルマはもういないのだろうか?ビバにはどうしてもそうは思えなかった。まるでスルマに会えるかのように、スルマがどこかあちらにいるかのように。ビバは家々をさまよい歩き、その魂はスルマを探し求めているかのようだった。髪を結う時間になると、彼女は黙って座っている。まるで今にもスルマがやって来て、髪を結ってくれるのを待っているかのようだ。いや、違う。夕暮れが訪れ、夜が来る。スルマはもう来ないのだ。髪を結ってもらうこともない。今日、ビバの顔はこんなにも曇り、こんなにも泣いているというのに、なぜスルマは来てくれないのだろう。スルマは決してそんなことはしなかったのに!ビバの顔が少しでも曇れば、すぐにスルマはそばに来て、首に抱きつき、心を癒すようにその顔を見つめてくれたものだ。ああ、今日という今日は、胸が張り裂けても彼女は来ないのだ。

ウダヤディティヤは、力の半分、魂の半分が失われてしまった。あらゆる行いにおける彼の希望であり、情熱であった者、その助言が唯一の支えであり、その微笑みが唯一の褒美であった者――その人が逝ってしまったのだ!彼は寝室へ行き、何かを思うように一度あたりを見回すが、誰もいない。ゆっくりとあの窓辺に来ては腰を下ろした。スルマが座っていた場所は、空けたままにして。空にはあの月明かり、目の前にはあの庭園、風も同じように吹いている――心の中で思った。こんな夕べに、スルマが来ないでいられるだろうか、と。

ふと、スルマのような声が聞こえた気がして、はっと身を起こした。あり得ないことだと分かっていても、一度あたりを見回し、一度寝台へ行き、誰かいないか確かめるのだった!かつては一日中、何百という細々とした仕事に追われていたウダヤディティヤ。貧しい民が畑や庭で採れた果物や野菜を贈り物として持参すると、彼は彼らの話を聞き、助言を与えたものだった。しかし近頃は、そういったことは何も手につかず、それでも夕暮れには疲れ果ててしまう――疲れた足取りで寝室へ向かう。心のどこかに、ふと寝室の扉を開ければ、あの窓辺にスルマが座っているのを見られるのではないかという、そんな期待があるのだ。ウダヤディティヤは、ビバが一人で悲しげな顔をしてさまよっているのを見ると、胸が張り裂けそうになった。ビバを近くに呼び、可愛がり、数々の優しい言葉をかける。しまいには、ビバは兄の手を握って泣き出し、ウダヤディティヤの目からも涙がこぼれ落ちるのだった!ある日、ウダヤディティヤはビバを呼んで言った。「ビバ、この家に一体お前にとって誰が残っているというのだ?お前を嫁ぎ先に送る手配をしてやろう。どうだ?私に恥ずかしがることはない、ビバ!お前は他に誰に心の願いを打ち明けられるというのだ?」ビバは黙ったまま、何も言わなかった。そんなこと、聞く必要があろうか?父の館に、これ以上いたいと思うだろうか?この世で彼女にとって唯一の安らぎの地、その場所――あのチャンドラドウィープへ行くために、彼女の心が逸らないわけがあろうか?しかし、彼女を迎えに来る者は一人として現れなかった!なぜ来ないのか?

ビバを嫁ぎ先に送るという提案を、ウダヤディティヤは一度父に持ち出した。プラタパディティヤは言った。「ビバを嫁ぎ先に送ることに異存はない。しかし、もしあちらがビバを大切に思う気持ちがあるのなら、自ら迎えの者をよこしただろう。我々がそこまでしゃかりきになる必要はあるまい!」

王妃はビバを見ては泣き暮らしていた。夫君がご存命でありながら、まるで後家のようなビバの境遇は、目も当てられないではないか?ビバの痛ましい顔を見ると、彼女の心は矢で射られたように痛んだ。それに、王妃は婿君をたいそう可愛がっていた。彼が何か子供じみたことをしたからといって、その結果がこれほどまでに及ぶとは、どうしても納得がいかなかった。彼女はマハラジャのもとへ行き、懇願した。「マハラジャ、ビバを嫁ぎ先へおやりください!」マハラジャは怒り、言った。「その話は何度も聞いた。もう私を煩わせるな。あちらがビバを乞い願う時が来れば、その時にくれてやる!」王妃は言った。「娘が長らく嫁ぎ先に行かなければ、世間の人々は何と言うでしょう?」プラタパディティヤは言った。「それに――このプラタパディティヤが自ら進んで娘を送り、もしラーマチャンドラ・ライが彼女を門前払いでもしたら、それこそ世間の人々は何と言うだろうか?」

王妃は泣きながら思った。マハラジャは時として、何をなさるか全く見当がつかない、と。